विश्वास का सरल अर्थ है भरोसा — भरोसा उस पर, जो सत्य है, जो खोजने, समझने और अनुभव करने के बाद भी न बदले, वही विश्वास है। अंधविश्वास वह विश्वास है जो सत्य को देखने की क्षमता खो देता है। "अंध" का अर्थ ही है — बिना देखे और बिना समझे स्वीकार कर लेना। जब आपके विश्वास का कोई आधार नहीं होता, तो वो अंधविश्वास होता है। दुनिया का हर विश्वास अनुभव से ही जन्मता है, जो पूर्णतः सत्य पर आधारित होता है।

एक उदाहरण से समझें

जब आपका बच्चा आपसे किसी धार्मिक कर्म या परंपरा का अर्थ पूछता है, और तब आप उसे टाल देते हैं, उत्तर नहीं दे पाते, बस कह देते हैं "है तो है" — तब वो विश्वास अंधविश्वास बन जाता है। ऐसा नहीं है कि आपके धार्मिक कर्मों के जो कारण हैं, उनके उत्तर नहीं हैं। उत्तर हैं, पर उन्हें खोजने के लिए अध्ययन और चिंतन चाहिए। हम उत्तर खोजने की मेहनत करने के बजाय कह देते हैं "बस ऐसा ही है" — और वहीं से अंधविश्वास जन्म लेता है।

अंधविश्वास तब होता है जब व्यक्ति बिना जाने, बिना समझे, बिना विचार किए किसी कर्म या मान्यता को अपनाता है। विश्वास हमेशा सत्य पर आधारित होता है, वहीं अंधविश्वास डर पर आधारित होता है — और अंधविश्वास हर प्रकार के प्रश्न से डरता है।

स्वामी विवेकानंद का प्रश्न

जब स्वामी विवेकानंद ने प्रश्न किया कि यदि शिव इतने शक्तिशाली हैं तो अपने प्रसाद को चूहे से क्यों नहीं बचा सके, तब उनकी माता उस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाईं। वह यह नहीं समझा सकीं कि संभव है उसी चूहे के रूप में स्वयं शिव या गणेश ने प्रसाद ग्रहण किया हो — कि समस्त सृष्टि में एक ही चेतना विद्यमान है, सब उसी परम सत्ता के रूप हैं। उत्तर न मिलने पर स्वामी विवेकानंद ने स्वयं खोज शुरू की, और इतिहास गवाह है कि प्रश्न करने की वही प्रवृत्ति आगे चलकर नए विचारों और नए मार्गों का कारण बनी।

आर्य समाज उसी प्रश्न की खोज का उत्तर है, जहाँ यज्ञ और हवन को महत्व दिया गया, ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया गया, लेकिन मूर्ति पूजा को नहीं। उन्होंने उन्हीं बातों को स्वीकार किया जिनके उत्तर और तर्क उन्हें सत्यार्थ प्रकाश में मिले।

प्रश्न करना अधर्म नहीं है। प्रश्न करना ही सत्य की ओर पहला कदम है। श्रद्धा और विवेक साथ चलें, तभी विश्वास प्रकाश बनता है — वरना वही अंधविश्वास में बदल जाता है।