कबीर कहा पुत्र से, बिन गुण जन्म न काज।
गुण बिन पुत्र न शोभई, जैसे दीप बिना ताज॥
पुराणों में बताया गया है कि स्वभाव और कर्म के आधार पर पुत्र चार प्रकार के संबंधों (ऋण) के कारण जन्म लेते हैं।
पहला पुत्र — लेनदार पुत्र
यह वह आत्मा है जो पिछले जन्म का लेनदार था। इस जन्म में पुत्र बनकर आता है, माता-पिता उसे पढ़ाते-लिखाते, विवाह कराते हैं, और इस तरह पुराने लेन-देन का हिसाब पूरा होकर वह अपने जीवन में स्थिर हो जाता है। पिछले जन्म में अगर आपने किसी का धन लिया है और उसे चुकाया नहीं है, तो वह इस जन्म में आपका पुत्र बनकर आता है और बीमारी, व्यसनों या फिजूलखर्ची के ज़रिए आपका सारा धन नष्ट कर देता है।
दूसरा पुत्र — दुश्मन पुत्र
कहा गया है कि पिछले जन्म का शत्रु भी पुत्र बनकर आ सकता है। ऐसा पुत्र जीवन में कदम-कदम पर दुःख, संघर्ष और टकराव देता है। यदि पिछले जन्म में आपने किसी को बहुत कष्ट दिया है, तो वह बदला लेने के लिए पुत्र बनकर आता है। ऐसा पुत्र बड़ा होकर घर में क्लेश करता है, माता-पिता को अपमानित करता है और उन्हें मानसिक पीड़ा देता है।
तीसरा पुत्र — उदासीन पुत्र
यह न सुख देता है न दुःख। बस नाम का पुत्र — न जुड़ाव, न विरोध; एक तरह की भावनात्मक दूरी। यह पुत्र न तो सेवा करता है और न ही दुख देता है, बस अपना जीवन जीता है। शादी के बाद ऐसे पुत्र अक्सर माता-पिता से अलग हो जाते हैं और अपनी गृहस्थी में मगन रहते हैं।
चौथा पुत्र — उपकारी पुत्र
सेवा भाव वाला पुत्र जो माता-पिता की सेवा कर पुराने उपकारों का ऋण चुकाता है। पिछले जन्म में यदि आपने निस्वार्थ सेवा की है, तो वह व्यक्ति पुत्र बनकर आपकी सेवा करने आता है। यह बुढ़ापे में लाठी बनता है और माता-पिता की खुशी को सर्वोपरि रखता है।
यह वर्गीकरण किसी को दोष देने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों को समझने और स्वीकार करने के लिए है। हर पुत्र के व्यवहार के पीछे एक कर्म-चक्र काम कर रहा होता है, और जब माता-पिता इसे समझ लेते हैं, तो अपेक्षा और दुःख दोनों हल्के हो जाते हैं।


