जहाँ भी जीवन है, वहाँ एक त्रिकोण है — तीन तरह का विभाजन।
- भूत, वर्तमान, भविष्य
- ब्रह्मा, विष्णु, महेश
- जन्म, पालन, विनाश
- इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन
- सत्व, रजस, तमस
- इच्छा, क्रिया, परिणाम
यह कोई संयोग नहीं। यह अस्तित्व का मूल विभाजन है। जब आप बात भी करते हैं, तो तीन ही तरह का विभाजन होता है —
- एक, जो आपको बोलना चाहिए
- एक, जो आपने बोला
- एक, जो आपने सोचा कि आप बोलेंगे
मनुष्य के भीतर तीन परतें
यहीं पूरा अस्तित्व छिपा है। मनुष्य कभी एक नहीं होता। उसके भीतर हमेशा तीन परतें चल रही होती हैं —
- कल्पना — मैं क्या करना चाहता हूँ
- वास्तविकता — मैंने क्या किया
- बोध — मुझे क्या करना चाहिए था
और इसी अंतराल में दुख जन्म लेता है। जैसे एक व्यक्ति प्रण लेता है — "आज मैं क्रोध नहीं करूँगा।" पर परिस्थिति आती है, वह क्रोधित हो जाता है। फिर सोचता है, "मुझे शांत रहना चाहिए था।" अब तीन व्यक्ति पैदा हो गए — आदर्श व्यक्ति, वास्तविक व्यक्ति, पछताने वाला — और यही विभाजन भीतर युद्ध पैदा करता है।


